दासस््यामि विबुधश्रेष्ठ कुण्डले वर्म चोत्तमम् । न मे कीर्ति: प्रणश्येत त्रिषु लोकेषु विश्रुता,आकाशमें विचरनेवालोंमें उत्तम सूर्यदेव! यदि पाण्डवोंके हितके लिये ब्राह्मणके छठद्मवेशमें अपनेको छिपाकर साक्षात् इन्द्रदेव मेरे पास भिक्षा माँगने आ रहे हैं तो देवेश्वर! मैं उन्हें दोनों कुण्डल और उत्तम कवच अवश्य दे दूँगा, जिससे तीनों लोकोंमें विख्यात हुई मेरी कीर्ति नष्ट न होने पाये
dāsyāmi vibudhaśreṣṭha kuṇḍale varma cottamam | na me kīrtiḥ praṇaśyet triṣu lokeṣu viśrutā ||
हे देवश्रेष्ठ! मैं दोनों कुण्डल और उत्तम कवच दान कर दूँगा। तीनों लोकों में विख्यात मेरी कीर्ति नष्ट न हो।
कर्ण उवाच