Ajñātavāsa-saṅkalpaḥ — Yudhiṣṭhira’s Resolve and Dhaumya’s Exempla on Concealment
यम उवाच मनो<नुकूलं बुधबुद्धिवर्धनं त्वया यदुक्तं वचन हिताश्रयम् । विना पुन: सत्यवतो<स्य जीवितं वरं द्वितीयं वरयस्व भामिनि,यमराज बोले--भामिनी! तूने जो सबके हितकी बात कही है, वह मेरे मनके अनुकूल है तथा विद्वानोंकी भी बुद्धिको बढ़ानेवाली है; अतः इस सत्यवानके जीवनको छोड़कर तू दूसरा कोई वर और माँग ले
yama uvāca mano'nukūlaṃ budha-buddhi-vardhanaṃ tvayā yad uktaṃ vacanaṃ hitāśrayam | vinā punaḥ satyavato'sya jīvitaṃ varaṃ dvitīyaṃ varayasva bhāmini ||
यमराज बोले—भामिनी! तूने जो हितकर वचन कहा है, वह मेरे मन के अनुकूल है और विद्वानों की बुद्धि बढ़ाने वाला भी है। इसलिए इस सत्यवान के जीवन को छोड़कर कोई दूसरा वर माँग ले।
यम उवाच