यक्षोपाख्यान-प्रवेशः
Entry into the Yakṣa-Lake Episode
सावित्रयुवाच सकृदंशो निपतति सकृत् कन्या प्रदीयते । सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सकृत् सकृत्,सावित्री बोली--भाइयोंमें धनका बँटवारा एक ही बार होता है, कन्या एक ही बार दी जाती है तथा श्रेष्ठ दाता “मैं दूँगा', यह कहकर एक ही बार वचनदान करता है। ये तीन बातें एक-एक बार ही होती हैं। सत्यवान् दीर्घायु हों या अल्पायु, गुणवान् हों या गुणहीन; मैंने उन्हें एक बार अपना पति चुन लिया। अब मैं दूसरे किसी पुरुषका वरण नहीं कर सकती
sāvitrī uvāca | sakṛd aṁśo nipatati sakṛt kanyā pradīyate | sakṛd āha dadānīti trīṇy etāni sakṛt sakṛt | satyavān dīrghāyuḥ vā alpayuḥ guṇavān vā guṇahīnaḥ | mayā sa eka-vāraṁ patiḥ vṛtaḥ | adhunā ahaṁ dvitīyaṁ puruṣaṁ na varayituṁ śaknomi |
सावित्री बोली—भाइयों में धन का बँटवारा एक ही बार होता है, कन्या एक ही बार दी जाती है और श्रेष्ठ दाता ‘मैं दूँगा’ कहकर एक ही बार वचन देता है—ये तीनों बातें एक-एक बार ही होती हैं। सत्यवान् दीर्घायु हों या अल्पायु, गुणवान् हों या गुणहीन—मैंने उन्हें एक बार पति रूप में चुन लिया है; अब मैं किसी अन्य पुरुष का वरण नहीं कर सकती।
नारद उवाच