कुन्ती द्वारा ब्राह्मण-सेवा
Kuntī’s Regulated Hospitality to a Brāhmaṇa Guest
त॑ दृष्टवावस्थितं संख्ये हरय: पवनात्मजम् । महत्या त्वरया राजनू् संन्यवर्तन्त सर्वश:,राजन! पवनकुमारको युद्धके लिये उपस्थित देख सभी वानर सब ओरसे बड़ी उतावलीके साथ लौट आये
taṁ dṛṣṭvāvasthitaṁ saṅkhye harayaḥ pavanātmajam | mahatyā tvarayā rājan saṁnyavartanta sarvaśaḥ ||
मार्कण्डेय बोले—राजन्! पवनपुत्र को युद्ध-पंक्ति में अडिग खड़ा देख, वानर सब ओर से बड़ी उतावली के साथ लौट आए और उसके चारों ओर एकत्र हो गए।
मार्कण्डेय उवाच