Sūrya’s Counsel to Karṇa on Indra’s Intended Request
Kuṇḍala–Kavaca Discourse
क्षिप्तामिषीकां काकाय चित्रकूटे महागिरौ । भवता पुरुषव्याघ्र प्रत्यभिज्ञानकारणात्,(एकाक्षिविकल: काक: सुदुष्टात्मा कृतश्न वै ।) 'पुरुषसिंह! उस कथाका मुख्य विषय यह है कि आपने महापर्वत चित्रकूटपर रहते समय किसी कौएके ऊपर एक सींकका बाण चलाया था और उस दुष्टात्मा कौएको एक आँखसे वंचित कर दिया था। यह प्रसंग उन्होंने केवल अपनी पहचान करानेके उद्देश्यसे प्रस्तुत किया था
Mārkaṇḍeya uvāca: kṣiptāmiṣīkāṃ kākāya Citrakūṭe mahāgirau | bhavatā puruṣavyāghra pratyabhijñāna-kāraṇāt (ekākṣi-vikalaḥ kākaḥ suduṣṭātmā kṛtaśna vai) ||
पुरुषव्याघ्र! चित्रकूट महागिरि पर रहते समय तुमने पहचान के हेतु एक कौए पर सींक का बाण फेंका था।
मार्कण्डेय उवाच