Sūrya’s Counsel to Karṇa on Indra’s Intended Request
Kuṇḍala–Kavaca Discourse
७८ हद लन्ध्ध्र्श ८ हु 4.29 ७// ०७ ५7४ ८ ८५० +* ब् प्रविशामो वयं तां तु बहुयोजनमायताम् । सान्धकारां सुविपिनां गहनां कीटसेविताम्,“वह कई योजन लंबी थी। उसमें अन्धकार भरा हुआ था। उसके भीतर घने जंगल थे। उस गहन गुफामें बहुत-से कीड़े रहा करते थे। उसमें प्रवेश करके हमने बहुत दूरतकका रास्ता पार कर लिया। तत्पश्चात् सूर्यके प्रकाशका दर्शन हुआ। उसी गुफाके अंदर एक दिव्य भवन शोभा पा रहा था
praviśāmo vayaṃ tāṃ tu bahuyojanamāyatām | sāndhakārāṃ suvipināṃ gahanāṃ kīṭasevitām ||
“हम उस गुफा में प्रविष्ट हुए, जो अनेक योजन तक फैली हुई थी। वह अन्धकार से भरी थी, भीतर घना वन था और गहनता में कीटों का निवास था। उसमें प्रवेश कर हम बहुत दूर तक मार्ग पार कर गए; तब हमें सूर्य का प्रकाश दिखाई दिया। और उसी गुफा के भीतर एक दिव्य भवन शोभायमान था।”
मार्कण्डेय उवाच