Sūrya’s Counsel to Karṇa on Indra’s Intended Request
Kuṇḍala–Kavaca Discourse
'क्या मैं युद्धमें शत्रुओंको मारकर जनकनन्दिनी सीताको साथ ले पुनः अयोध्यामें रहकर राज्य करूँगा? ।। अमोक्षयित्वा वैदेहीमहत्वा च रणे रिपून् । ह्ृतदारोडवधूतश्न नाहं जीवितुमुत्सहे,“विदेहनन्दिनी सीताको बिना छुड़ाने तथा समरभूमिमें शत्रुओंका बिना संहार किये पत्नीको खोकर और अवधूत बनकर मैं जीवित नहीं रह सकता”
kim ahaṃ yuddhe śatrūn hatvā janakanandinīṃ sītāṃ sārdhaṃ punar ayodhyāyāṃ nivasan rājyaṃ kariṣyāmi? amokṣayitvā vaidehīm ahatvā ca raṇe ripūn hṛtadāro 'vadhūtaś ca nāhaṃ jīvitum utsahe.
“क्या मैं युद्ध में शत्रुओं का संहार करके और जनकनन्दिनी सीता को छुड़ाकर फिर अयोध्या लौटकर राज्य कर सकूँगा? वैदेही को मुक्त किए बिना और रणभूमि में शत्रुओं का वध किए बिना—पत्नी से वंचित, धूल-धूसरित अवधूत-सा होकर—मैं जीवित रहने का साहस नहीं कर सकता।”
मार्कण्डेय उवाच