Sāvitrī’s Report and Nārada’s Prognosis (सावित्र्याख्यान—सत्यवान्-गुणवर्णनं तथा अल्पायुषः पूर्वसूचना)
इत्येवं ब्रुवतस्तस्य स््रोतो भ्यस्तेजसो<र्चिष: । निश्चैरुर्दहातो रात्रौ वृक्षस्येव स्वरन्ध्रत:,इस प्रकार बोलते हुए रावणके कान, नाक एवं आँख आदि छिठ्रोंसे उसी प्रकार आगकी चिनगारियाँ निकलने लगीं, जिस प्रकार रातको जलते हुए वृक्षके छेदोंसे आगकी लपटें निकलती हैं
इस प्रकार बोलते हुए उसके कान-नाक-आँख आदि छिद्रों से तेज की चिनगारियाँ निकलने लगीं, जैसे रात में जलते हुए वृक्ष के छेदों से लपटें निकलती हैं।
(श्रीरम उवाच