नियन्तारमसाधूनां गोप्तारं धर्मचारिणाम् | धृतिमन्तमनाधृष्यं जेतारमपराजितम्,उन सभी श्रेष्ठ मन्त्रियोंने राजाके इस समयोचित प्रस्तावका अनुमोदन किया। श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर नेत्र कुछ-कुछ लाल थे और भुजाएँ बड़ी एवं घुटनों तक लंबी थीं। वे मतवाले हाथीके समान मस्तानी चालसे चलते थे। उनकी ग्रीवा शंखके समान सुन्दर थी, उनकी छाती चौड़ी थी और उनके सिरपर काले-काले घुँघराले बाल थे। उनकी देह दिव्य दीप्तिसे दमकती रहती थी। युद्धमें उनका पराक्रम देवराज इन्द्रसे कम नहीं था। वे समस्त धर्मोंके पारंगत विद्वान् और बृहस्पतिके समान बुद्धिमान् थे। सम्पूर्ण प्रजाका उनमें अनुराग था। वे सभी विद्याओंमें प्रवीण तथा जितेन्द्रिय थे। उनका अद्भुत रूप देखकर शत्रुओंके भी नेत्र और मन लुभा जाते थे। वे दुष्टोंका दमन करनेमें समर्थ, साधुओंके संरक्षक, धर्मात्मा, धैर्यवान, दुर्धर्ष, विजयी तथा किसीसे भी परास्त न होनेवाले थे। कुरुनन्दन! कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले अपने पुत्र श्रीरामको देख-देखकर राजा दशरथको बड़ी प्रसन्नता होती थी
niyantāram asādhūnāṃ goptāraṃ dharmacāriṇām | dhṛtimantam anādhṛṣyaṃ jetāram aparājitam ||
मार्कण्डेय बोले—वह दुष्टों का नियन्ता और धर्माचारी जनों का रक्षक था; धैर्य से सम्पन्न, अजेय, दुर्धर्ष—विजयी और कभी पराजित न होने वाला।
मार्कण्डेय उवाच
The verse defines righteous power: a true leader restrains the wicked and protects dharma-practitioners, combining moral purpose with unwavering fortitude and invincibility. Strength is portrayed as legitimate when it serves ethical order (dharma) rather than personal gain.
Mārkaṇḍeya is praising the hero’s qualities in a compact set of epithets—depicting him as a guardian of the righteous and a check on wrongdoing, endowed with steadfast courage and undefeated prowess—within a broader descriptive passage celebrating Rāma’s excellence.