Daśagrīva-boonāvaraṇa, Viṣṇv-avatāra-niyoga, Vānara-sahāya-janana, Mantharā-nirmāṇa
संविभक्ता च दाता च भोगवान् सुखवान् नर: । भवत्यहिंसकश्चैव परमारोग्यमश्चुते,“जो देवताओं और अतिथियोंको उनका भाग समर्पित करता है वह भोगसामग्रीसे सम्पन्न होता है। दान करनेवाला मनुष्य सुखी होता है। जो किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करता उसे उत्तम आरोग्यकी प्राप्ति होती है
saṃvibhaktā ca dātā ca bhogavān sukhavān naraḥ | bhavaty ahiṃsakaś caiva paramārogyam aśnute ||
वैशम्पायन बोले— जो यथोचित भाग बाँटकर—विशेषतः देवताओं और अतिथियों को—अर्पित करता है, वह भोग-साधनों से सम्पन्न होता है। दान करनेवाला मनुष्य सुखी रहता है। और जो समस्त प्राणियों के प्रति अहिंसक है, वह उत्तम आरोग्य प्राप्त करता है।
वैशम्पायन उवाच