मარკण्डेयागमनम् तथा सत्यव्रत-उपदेशः
Arrival of Mārkaṇḍeya and Counsel on Truth-Vows
ज्याघोषश्लैव पार्थानां ब्रह्मघोषश्वन धीमताम् । संसृष्टं ब्रह्मणा क्षत्रं भूय एव व्यरोचत,कुन्तीपुत्रोंके धनुषकी प्रत्यंचाका टंकार-शब्द और बुद्धिमान ब्राह्मणोंके वेदमन्त्रोंका घोष दोनों मिलकर ऐसे प्रतीत होते थे, मानो ब्राह्मणत्व और क्षत्रियत्वका सुन्दर संयोग हो रहा था
jyāghoṣaś caiva pārthānāṁ brahmaghoṣaś ca dhīmatām | saṁsṛṣṭaṁ brahmaṇā kṣatraṁ bhūya eva vyarocat ||
वैशम्पायन बोले—पार्थों के धनुषों की प्रत्यंचाओं का टंकार और बुद्धिमान ब्राह्मणों के वेदमंत्रों का गंभीर घोष—दोनों एक साथ उठे। वे मिलकर मानो एक ही नाद बन गए, और उससे ब्राह्मणत्व की पवित्रता तथा क्षत्रियत्व के पराक्रम का सुन्दर संयोग और भी अधिक प्रकाशित हो उठा—जैसे शक्ति, ज्ञान और संयम के मार्गदर्शन में ही श्रेष्ठ होती है।
वैशम्पायन उवाच