Draupadī-apaharaṇa-saṃdeśaḥ
Report of Draupadī’s Abduction and the Pāṇḍavas’ Pursuit
हि मय ० (0) है 7 द्विपज्चाशर्दाधिकद्विशततमो< ध्याय: सर्नेपर दुर्योधन धनको समझाना और कर्णके अनुरोध करनेपर दुयोधनका अनशन त्याग करके हस्तिनापुरको प्रस्थान दानवा ऊचु: भो: सुयोधन राजेन्द्र भरतानां कुलोद्वह । शूरै: परिवृतो नित्यं तथैव च महात्मभि:,दानव बोले--भरतवंशका भार वहन करनेवाले महाराज सुयोधन! आप सदा शूरवीरों तथा महामना पुरुषोंसे घिरे रहते हैं, फिर आपने यह आमरण उपवास करनेका साहस क्यों किया है? आत्महत्या करनेवाला पुरुष तो अधोगतिको प्राप्त होता है और लोकमें उसकी निन््दा होती है, जो अयश फैलानेवाली है
vaiśaṃpāyana uvāca — dānavā ūcuḥ: bhoḥ suyodhana rājendra bharatānāṃ kulodvaha | śūraiḥ parivṛto nityaṃ tathaiva ca mahātmabhiḥ ||
वैशम्पायन बोले—दानवों ने कहा—“हे सुयोधन! राजाओं में श्रेष्ठ, भरतवंश के कुलोद्धारक! आप सदा शूरवीरों और महामना पुरुषों से घिरे रहते हैं; फिर आपने यह आमरण उपवास करने का साहस क्यों किया? जो पुरुष अपने प्राणों का नाश करता है, वह अधोगति को प्राप्त होता है और लोक में निन्दा पाता है—जो केवल अयश फैलाती है।”
वैशम्पायन उवाच