Draupadī’s Rebuke of Jayadratha and Dhaumya’s Admonition (Āraṇyaka-parva, Adhyāya 252)
या गतिस्तव राजेन्द्र सास्माकमपि भारत । कथं वा सम्प्रवेक्ष्यामस्त्वद्विहीना: पुरं वयम्
“राजेन्द्र! आपकी जो गति होगी वही हमारी भी होगी। हे भरतवंशी! आपके बिना हम नगर में कैसे प्रवेश करेंगे?”
वैशम्पायन उवाच