द्रौपदी-शैब्यसंवादः — Draupadī’s Identification and Counsel on Hospitality
तैर्मोक्षितो<हं दुर्बृद्धिर्दत्तं तैरैव जीवितम् । जिनका मैंने सदा तिरस्कार किया और जिनका मैं सर्वदा शत्रु बना रहा, उन्हीं लोगोंने मुझ दुर्बुद्धिको शत्रुओंके बन्धनसे छुड़ाया है और उन्होंने ही मुझे जीवनदान दिया है ।। ७३ || प्राप्त: स्यां यद्य॒हं वीर वधधं तस्मिन् महारणे
Duryodhana uvāca: tair mokṣito 'haṁ durbuddhir dattaṁ tair eva jīvitam |
मैं दुर्बुद्धि उन्हीं के द्वारा छुड़ाया गया हूँ; जीवन भी उन्हीं ने मुझे दिया है। जिनका मैं सदा तिरस्कार करता रहा और जिनका मैं निरंतर शत्रु बना रहा—उन्हीं ने मुझे शत्रुओं के बंधन से मुक्त करके जीवनदान दिया।
दुर्योधन उवाच