द्रौपदी-शैब्यसंवादः — Draupadī’s Identification and Counsel on Hospitality
दुःखित: पादयोस्तस्य नेत्रजं जलमुत्सूजन् । उक्तवांश्व॒ नरव्याप्रो नैतदेवं भविष्यति,दुर्योधनकी यह बात सुनकर दुःशासनका गला भर आया। वह अत्यन्त दुःखसे आतुर हो दीनभावसे हाथ जोड़कर अपने बड़े भाईके चरणोंमें गिर पड़ा और गदगद वाणीमें व्यथित चित्तसे इस प्रकार बोला--'भैया! आप प्रसन्न हों?” ऐसा कहकर वह धरतीपर लोट गया और दु:खसे कातर हो दुर्योधनके दोनों चरणोंमें अपने नेत्रोंका अश्रुजल चढ़ाता हुआ नरश्रेष्ठ द:शासन यों बोला--“नहीं, ऐसा नहीं होगा
Vaiśampāyana uvāca: duḥkhitaḥ pādayos tasya netrajaṃ jalam utsṛjan, uktavān sa naravyāghro naitad evaṃ bhaviṣyati.
वैशम्पायन बोले—दुःख से अभिभूत होकर वह अपने भाई के चरणों में गिर पड़ा और आँखों से आँसू बहाने लगा। फिर वह नर-व्याघ्र शोक से गला भर आने पर व्यथित चित्त से बोला—“नहीं—ऐसा नहीं होगा।”
वैशम्पायन उवाच