द्वैतवनगमनम् (Dvāitavana-gamanam) — Journey and Settlement at Dvaita Forest-Lake
त॑ं धर्मराजो विमना इवाब्रवीत् सर्वे द्विया सन्ति तपस्विनो5मी । भवानिदं कि स्मयतीव हृष्ट- स्तपस्विनां पश्यतां मामुदीक्ष्य,तब धर्मराज युधिष्ठिरने उदासीन-से होकर पूछा--'मुने! ये सब तपस्वी तो मेरी अवस्था देखकर कुछ संकुचित-से हो रहे हैं, परंतु क्या कारण है कि आप इन सब महात्माओंके सामने मेरी ओर देखकर प्रसन्नतापूर्वक यों मुसकराते-से दिखायी देते हैं?
taṁ dharmarājo vimanā ivābravīt sarve dvijā santi tapasvino ’mī | bhavān idaṁ kiṁ smayatīva hṛṣṭas tapasvināṁ paśyatāṁ mām udīkṣya ||
तब धर्मराज युधिष्ठिर ने उदास-से होकर कहा—“मुने! ये सब द्विज तपस्वी मेरी दशा देखकर संकुचित-से हो रहे हैं; पर आप इन तपस्वियों के सामने मेरी ओर देखकर प्रसन्न-से क्यों मुसकराते प्रतीत होते हैं?”
वैशम्पायन उवाच