
मृगस्वप्नदर्शनम् (The Deer’s Dream-Appeal and the Move to Kāmyaka)
Upa-parva: Dvaītavana–Kāmyaka Vihāra Episode (Forest Relocation after the Duryodhana Incident)
Janamejaya asks what the Pāṇḍavas did in the forest after releasing Duryodhana. Vaiśaṃpāyana relates that, at night in Dvaītavana, Yudhiṣṭhira experiences a dream-vision in which deer—fearful and reduced to remnants—approach with folded hands and request relief, stating their clans have been nearly exhausted by hunting. Yudhiṣṭhira, distressed yet committed to universal welfare (sarvabhūta-hita), affirms their claim and resolves to act accordingly. Upon waking near dawn, he informs his brothers that compassion toward forest-dwellers is required and proposes a residence-change. The group then departs promptly with accompanying brāhmaṇas and attendants (including Indrasena and others), travels along pleasant routes with clean water, and arrives at the sacred Kāmyaka āśrama-forest near Tṛṇabindu-saras, entering it as if into a meritorious, heaven-like refuge.
Chapter Arc: गन्धर्वों के हाथों कौरव अपमानित और बंधक—और वन में बैठे पाण्डवों के सामने अचानक यह प्रश्न: क्या शत्रु-भाइयों को छुड़ाना भी अपना धर्म है? → युधिष्ठिर भीम को आदेश देते हैं कि कौरवों का मोचन कराया जाए, पर उपाय ‘साम’ (शान्ति-वार्ता) से हो—क्योंकि ज्ञातियों में कलह स्वाभाविक है, पर बाहरी आक्रमण के सामने कुल-धर्म जागता है। भीम का क्रोध और पुराना वैर भीतर-भीतर उबलता है; फिर भी युधिष्ठिर यज्ञ-दीक्षा/व्रत-बंधन के कारण स्वयं न जा पाने की विवशता बताते हैं और भीम को संयमित नीति का निर्देश देते हैं। → अर्जुन सत्यवादी प्रतिज्ञा करते हैं—यदि गन्धर्व समझाने से कौरवों को न छोड़ें, तो आज गन्धर्वराज की भूमि रक्त पियेगी; यह वचन सुनकर कौरवों में फिर से आशा और साहस लौट आता है। → युधिष्ठिर का निर्णय स्पष्ट हो जाता है: कौरवों का उद्धार किया जाए, पर पहले शान्ति-प्रयास; और पाण्डव-पक्ष से अर्जुन का संकल्प इस कार्य को निर्णायक दिशा देता है। → क्या गन्धर्व ‘साम’ से मानेंगे, या अर्जुन की प्रतिज्ञा युद्ध में बदलकर रक्तपात कराएगी?
Verse 1
हि >> आय न () हि ० त्रिचत्वारिशर्दाधिकद्विशततमो< ध्याय: युधिष्ठिरका भीमसेनको गन्धवॉंके हाथसे कौरवोंको छुड़ानेका आदेश और इसके लिये अर्जुनकी प्रतिज्ञा युधिषछ्िर उवाच अस्मानभिगतांस्तात भयातज्छरणैषिण: । कौरवान् विषमप्राप्तान् कथं ब्रूयास्त्वमीदूशम्
युधिष्ठिर बोले—“तात! ये लोग भय से पीड़ित होकर शरण की इच्छा से हमारे पास आए हैं। कौरव इस समय भारी संकट में पड़ गए हैं; फिर तुम ऐसी कठोर बात कैसे कह रहे हो?”
Verse 2
भवन्ति भेदा ज्ञातीनां कलहाश्च वृकोदर । प्रसक्तानि च वैराणि कुलधर्मो न नश्यति
युधिष्ठिर बोले—“हे वृकोदर! ज्ञाति-बंधुओं में मतभेद और कलह होते रहते हैं। कभी-कभी वैर भी दृढ़ हो जाते हैं; पर इससे कुलधर्म—अपनापन—नष्ट नहीं होता, हे भीमसेन।”
Verse 3
यदा तु कश्चिज्ज्ञातीनां बाह्ुः पोथयते कुलम् | न मर्षयन्ति तत् सन््तो बाह्ेनाभिप्रधर्षणम्
जब कोई बाहरी मनुष्य उनके कुल पर आक्रमण करके वंश को कुचलना चाहता है, तब श्रेष्ठ पुरुष उस पराये आक्रान्ता द्वारा अपने कुल का अपमान और बलात् दमन सहन नहीं करते।
Verse 4
(परै: परिभवे प्राप्ते वयं पञ्चोत्तरं शतम् | परस्परविरोधे तु वयं पञ्च शतं तु ते ।।
जब दूसरों के हाथों हम पर अपमान आता है, तब उसका सामना करने के लिए हम एक सौ पाँच भाई एक साथ हो जाते हैं। परन्तु आपस में विरोध हो तो हम पाँच एक ओर रह जाते हैं और वे सौ दूसरी ओर। यह खोटी बुद्धि वाला गन्धर्व जानता है कि हम यहाँ दीर्घकाल से रहते आए हैं; फिर भी हमारा तिरस्कार करके चित्रसेन ने यह अप्रिय कर्म किया है।
Verse 5
दुर्योधनस्य ग्रहणाद् गन्धर्वेण बलात् प्रभो | स्त्रीणां बाह्माभिमर्शाच्च हतं भवति न: कुलम्
हे प्रभो! गन्धर्व द्वारा बलपूर्वक दुर्योधन के पकड़े जाने से और बाहरी पुरुष की भुजाओं के स्पर्श से कुरुकुल की स्त्रियों का अपमान होने से हमारा कुल मानो मारा गया है; ऐसा सार्वजनिक अपमान कुल के लिए मृत्यु के समान है।
Verse 6
शरणं च प्रपन्नानां त्राणार्थ च कुलस्य च । उत्तिष्ठत नरव्यात्रा: सज्जीभवत मा चिरम्
शरणागतों की रक्षा और कुल की लाज बचाने के लिए उठो, हे नरव्याघ्रों! शीघ्र सज्ज हो जाओ; विलम्ब मत करो।
Verse 7
अर्जुनश्न यमौ चैव त्वं च वीरापराजित: । मोक्षयध्वं नरव्याप्रा हियमाणं सुयोधनम्
वीर अर्जुन, नकुल-सहदेव और तुम भी—अपराजित योद्धा—हे नरवीरो! गन्धर्व द्वारा हरण किए जा रहे सुयोधन (दुर्योधन) को छुड़ा लाओ।
Verse 8
एते रथा नरव्याप्रा: सर्वशस्त्रसमन्विता: । धृतराष्ट्रस्य पुत्राणां विमला: काज्चनध्वजा:
युधिष्ठिर बोले—ये रथ वीर योद्धाओं से युक्त और सब प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित हैं। ये धृतराष्ट्र के पुत्रों के हैं—निर्मल, और स्वर्णध्वजाओं से शोभित।
Verse 9
सस्वनानधिरोहध्वं नित्यसज्जानिमान् रथान् | इन्द्रसेनादिभि: सूतै: कृतशस्त्रैरधिष्ठितान्
युधिष्ठिर बोले—इन सदा सुसज्जित रथों पर, जिनके चलने से गम्भीर नाद होता है, तुरंत आरूढ़ हो जाओ। इन्द्रसेन आदि कुशल सारथी, शस्त्र-सम्पन्न होकर, इन्हें संभाले हुए हैं।
Verse 10
एतानास्थाय वै यत्ता गन्धर्वान् योद्धुमाहवे । सुयोधनस्य मोक्षाय प्रयतध्वमतन्द्रिता:
युधिष्ठिर बोले—इन पर आरूढ़ होकर, पूर्ण तैयारी के साथ, रण में गन्धर्वों से युद्ध करने जाओ। सुयोधन के उद्धार के लिये, आलस्य त्यागकर, प्रयत्न करो।
Verse 11
नरसिंहो! कौरवोंके ये सुनहरी ध्वजावाले निर्मल रथ सामने खड़े हैं। इनमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र मौजूद हैं। इनके चलनेपर भारी आवाज होती है। ये रथ सदा सुसज्जित रहते हैं। शस्त्रविद्यामें निपुण इन्द्रसेन आदि सारथि इनपर बैठे हुए हैं। तुमलोग इन रथोंपर आरूढ़ हो गन्धर्वोंसे युद्ध करनेके लिये तैयार हो जाओ और सावधान होकर दुर्योधनको छुड़ानेका प्रयत्न करो ।। य एव ककश्रिद् राजन्य: शरणार्थमिहागतम् । परं शक््त्याभिरक्षेत कि पुनस्त्वं वृकोदर
युधिष्ठिर बोले—नरसिंह! कौरवों के ये स्वर्णध्वज-युक्त निर्मल रथ सामने खड़े हैं। इनमें सब प्रकार के अस्त्र-शस्त्र हैं; चलने पर ये भारी गर्जना करते हैं। ये रथ सदा सुसज्जित रहते हैं; शस्त्रविद्या में निपुण इन्द्रसेन आदि सारथी, शस्त्र-तत्पर होकर, इन्हें संभाले बैठे हैं। तुम लोग इन रथों पर आरूढ़ हो गन्धर्वों से युद्ध के लिये तैयार हो जाओ; सावधान रहकर दुर्योधन को छुड़ाने का प्रयत्न करो। जो कोई साधारण क्षत्रिय भी शरण लेने आये हुए की यथाशक्ति रक्षा करता है—तो फिर तुम, वृकोदर भीमसेन, शरणागत की रक्षा करो, इसमें कहना ही क्या है?
Verse 12
(वैशग्पायन उवाच एवमुक्तस्तु कौन्तेय: पुनर्वाक्यमभाषत । कोपसंरक्तनयन: पूर्ववैरमनुस्मरन् ।।
वैशम्पायन बोले—युधिष्ठिर के ऐसा कहने पर कुन्तीपुत्र भीमसेन ने फिर उत्तर दिया। पूर्व वैर का स्मरण करते हुए क्रोध से उसकी आँखें लाल हो उठीं।
Verse 13
वरप्रदानं राज्यं च पुत्रजन्म च पाण्डवा: | शत्रोश्व मोक्षणं क्लेशात् त्रीणि चैक च तत्समम्
वैशम्पायन बोले—हे पाण्डवो! वरदान देना, राज्य प्रदान करना और पुत्र-प्राप्ति कराना—ये तीन; तथा शत्रु के संकट से किसी का उद्धार करना—ये चारों पुण्य में समान हैं।
Verse 14
कि चाप्यधिकमेतस्माद् यदापन्न: सुयोधन: । त्वदूबाहुबलमाश्रित्य जीवितं परिमार्गते
और इससे बढ़कर आनंद की बात क्या होगी कि विपत्ति में पड़ा सुयोधन तुम्हारे बाहुबल का आश्रय लेकर अपने प्राणों की रक्षा चाहता है?
Verse 15
स्वयमेव प्रधावेयं यदि न स्यथाद् वृकोदर । विततो मे क्रतुर्वीर न हि मेडत्र विचारणा
वैशम्पायन बोले—हे वृकोदर! यदि मेरा यज्ञ आरम्भ न हो गया होता तो, हे वीर, मैं स्वयं ही दौड़कर सुयोधन को छुड़ाने जाता; इस विषय में मेरे लिए विचार-विमर्श का अवकाश नहीं।
Verse 16
साम्नैव तु यथा भीम मोक्षयेथा: सुयोधनम् | तथा सर्वैरुपायैस्त्वं यतेथा: कुरुनन्दन,“कुरुनन्दन भीम! शान्तिपूर्ण ढंगसे समझा-बुझाकर जिस तरह भी दुर्योधनको छुड़ा सको, सभी उपायोंसे वैसा ही प्रयत्न करना
वैशम्पायन बोले—हे भीम, हे कुरुनन्दन! जैसे केवल साम से समझा-बुझाकर तुम सुयोधन को छुड़ा सको, वैसे ही तुम सब उपायों से प्रयत्न करना।
Verse 17
न सामना प्रतिपद्येत यदि गन्धर्वराडसौ । पराक्रमेण मृदुना मोक्षयेथा: सुयोधनम्
वैशम्पायन बोले—यदि वह गन्धर्वराज साम से न माने, तो कोमल और संयत पराक्रम के द्वारा सुयोधन को छुड़ाने का प्रयत्न करना।
Verse 18
अथासौ मृदुयुद्धेन न मुड्चेद् भीम कौरवान् । सर्वोपायैर्विमोच्यास्ते निगृह्ु परिपन्थिन:
वैशम्पायन बोले—भीम! यदि वह कोमल युद्ध से भी कौरवों को न छोड़े, तो तुम सब उपायों से उन परिपन्थी गन्धर्वों को पकड़कर बाँधो और कौरवों को छुड़ाओ।
Verse 19
एतावद्धि मया शक्यं संदेष्ठूं वै वृकोदर । वैताने कर्मणि तते वर्तमाने च भारत,“भरतनन्दन वृकोदर! इस समय मेरा यह यज्ञकर्म चालू है; अतः ऐसी स्थितिमें मैं तुम्हें इतना ही संदेश दे सकता हूँ”
वृकोदर! मैं इतना ही संदेश दे सकता हूँ; क्योंकि, हे भारत, इस समय वैतान यज्ञकर्म चल रहा है, अतः मैं इससे अधिक नहीं कह सकता।
Verse 20
वैशम्पायन उवाच अजाततशत्रोर्वचनं जी धनंजय: । प्रतिजज्ञे गुरोर्वाक््यं | विमोक्षणम्
वैशम्पायन बोले—जनमेजय! अजातशत्रु युधिष्ठिर के वचन सुनकर धनंजय अर्जुन ने बड़े भाई की आज्ञा मानकर कौरवों के विमोचन की प्रतिज्ञा की।
Verse 21
अर्जुन उवाच यदि साम्ना न मोक्ष्यन्ति गन्धर्वा धृतराष्ट्रजान् । अद्य गन्धर्वराजस्य भूमि: पास्यति शोणितम्
अर्जुन बोले—यदि समझाने-बुझाने से गन्धर्व धृतराष्ट्र के पुत्रों को नहीं छोड़ेंगे, तो आज यह पृथ्वी गन्धर्वराज का रक्त पियेगी।
Verse 22
अर्जुनस्य तु तां श्रुत्वा प्रतिज्ञां सत्यवादिन: । कौरवाणां तदा राजन् पुनः प्रत्यागतं मन:,राजन! सत्यवादी अर्जुनकी वह प्रतिज्ञा सुनकर कौरवोंके जीमें जी आया
राजन्! सत्यवादी अर्जुन की वह प्रतिज्ञा सुनकर कौरवों के प्राणों में प्राण आए; उनका मन फिर से स्थिर और आश्वस्त हो गया।
Verse 243
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनमोचनानुज्ञायां त्रिचत्वारिंशदधिकद्धिशततमो<5 ध्याय:
इस प्रकार श्रीमहाभारत के वनपर्व के अन्तर्गत घोषयात्रापर्व में दुर्योधन के मोचन की अनुमति-विषयक दो सौ तैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
The tension between survival-practices in exile (hunting and resource use) and the duty to prevent ecological and communal harm; the chapter frames leadership as the willingness to reduce one’s own extraction when the vulnerable report depletion.
Ethical authority is demonstrated through compassion translated into policy: hearing a petition, verifying its truth, and altering behavior—here, relocating the camp—so that welfare extends beyond one’s immediate community.
No explicit phalaśruti is stated in these verses; the chapter’s function is narrative-ethical exemplification, showing how dharma operates as practical decision-making within the exile setting.
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