वनप्रस्थानम् (Departure for the Forest) — Āraṇyaka-parva, Adhyāya 24
स तत्र सिद्धानभिवाद्य सर्वान् प्रत्यर्चितो राजवद् देववच्च । विवेश सर्व: सहितो द्विजाग्रयै: कृताञ्जलि।धर्धर्म भृतां वरिष्ठ:,वहाँ आये हुए समस्त सिद्धोंको प्रणाम करके धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर उनके द्वारा भी राजा तथा देवताके समान पूजित हुए एवं दोनों हाथ जोड़कर उन्होंने उन समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ वनके भीतर पदार्पण किया
sa tatra siddhān abhivādya sarvān pratyarcito rājavad devavac ca | viveśa sarvaḥ sahito dvijāgryaiḥ kṛtāñjalir dharma-bhṛtāṃ variṣṭhaḥ ||
वहाँ आए हुए समस्त सिद्धों को प्रणाम करके, धर्मभृतों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर उनके द्वारा भी राजा तथा देवता के समान पूजित हुए। फिर दोनों हाथ जोड़कर, उन समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मणों के साथ वे वन के भीतर प्रविष्ट हुए।
वैशम्पायन उवाच