चित्रसेन-समागमः / The Engagement with Citrasena and the Gandharvas
क्षेत्राद् वनाद् वा ग्रामाद् वा भर्तारें गृहमागतम् | अभ्युत्थायाभिनन्दामि आसनेनोदकेन च,“खेतसे, वनसे अथवा गाँवसे जब कभी मेरे पति घर पधारते हैं, उस समय मैं खड़ी होकर उनका अभिनन्दन करती हूँ; तथा आसन और जल अर्पण करके उनके स्वागत- सत्कारमें लग जाती हूँ
kṣetrād vanād vā grāmād vā bhartāraṁ gṛham āgatam | abhyutthāyābhinandāmi āsanenodakena ca ||
वैशम्पायन बोले—खेत से, वन से अथवा गाँव से जब मेरे पति घर आते हैं, तब मैं उठकर श्रद्धापूर्वक उनका अभिनन्दन करती हूँ; और आसन तथा जल अर्पित करके उनके सत्कार में लग जाती हूँ।
वैशम्पायन उवाच