Duryodhana’s Śaraṇāgati and the Pāṇḍavas’ Resolve
Gandharva Encounter
उत्पपात दिवं शुभ्र॑ कालेनाभिप्रचोदितम् । ते पिबन्त इवाकाशं त्रासयन्तश्नराचरान्
utpapāta divaṁ śubhraḥ kālenābhipracoditam | te pibanta ivākāśaṁ trāsayantaś carācarān |
मार्कण्डेयजी बोले—काल के वेग से प्रेरित होकर वह उज्ज्वल रथ आकाश की ओर उछल पड़ा। वे मानो आकाश को पीते हुए चल रहे हों और चर-अचर समस्त प्राणियों को भयभीत कर रहे हों।
मार्कण्डेय उवाच