आरण्यकपर्वणि अध्यायः २१६ — इन्द्र-स्कन्द-संमुखता वज्रप्रहारश्च
Indra approaches Skanda; vajra strike and the arising of Viśākha
मातापित्रो: सकाशं हि गत्वा त्वं द्विजसत्तम । अलन्द्रितः कुरु क्षिप्रं मातापित्रोर्हि पूजनम् । अत: परमहं धर्म नानन््यं पश्यामि कंचन
व्याध बोला—हे द्विजसत्तम! माता-पिता के पास जाकर आलस्य त्यागकर शीघ्र ही उनकी पूजा-सेवा में लग जाओ। इससे बढ़कर मैं कोई धर्म नहीं देखता।
व्याध उवाच