Skanda-janma: Śivā/Svāhā, Agni, and the Manifestation of Guha
Mahābhārata 3.214
योगिनामेष मार्गस्तु येन गच्छन्ति तत् परम् | जितक्लमा: समा धीरा मूर्थन्यात्मानमादधु: । एवं सर्वेषु विततौ प्राणापानौ हि देहिषु,जिन्होंने समस्त क्लेशोंको जीत लिया है, जो समदर्शी और धीर हैं, जिन्होंने (सुषुम्णा नाड़ीके द्वारा) अपने प्रागमय आत्माको मस्तक (वर्ती सहस्रारचक्र)-में ले जाकर स्थापित किया है, उन योगियोंके लिये यह (मस्तकसे लेकर पायुतकका सुषुम्णामय) मार्ग है, जिससे वे उस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं। इस प्रकार समस्त जीवात्माओंके शरीरोंमें ये प्राणवायु और अपानवायु व्याप्त हैं
vyādha uvāca | yoginām eṣa mārgaḥ tu yena gacchanti tat param | jitaklamāḥ samā dhīrā mūrdhany ātmānam ādadhuḥ | evaṁ sarveṣu vitatau prāṇāpānau hi dehiṣu |
यह योगियों का मार्ग है, जिससे वे उस परम तत्त्व को प्राप्त होते हैं। जिन्होंने क्लेश और श्रम को जीत लिया है, जो समदर्शी और धीर हैं, वे आत्मा को मूर्धा में स्थापित करते हैं। इस प्रकार समस्त देहधारियों में प्राण और अपान सर्वत्र व्याप्त हैं।
व्याध उवाच