अग्निनाम-प्रादुर्भावः प्रायश्चित्त-विधानं च
Agni’s Epithets, Manifestations, and Expiation Procedures
पापं चिन्तयते चैव ब्रवीति च करोति च । तस्याधर्मप्रवृत्तस्य गुणा नश्यन्ति साधव:,रागरूपी दोषके कारण उसके द्वारा तीन प्रकारके अधर्म होने लगते हैं--१. वह मनसे पापका चिन्तन करता है, २. वाणीसे पापकी ही बात बोलता है और 3३. क्रियाद्वारा भी पापका ही आचरण करता है। इस प्रकार अधर्ममें लग जानेपर उसके सभी अच्छे गुण नष्ट हो जाते हैं
pāpaṃ cintayate caiva bravīti ca karoti ca | tasyādharmapravṛttasya guṇā naśyanti sādhavaḥ ||
वह पाप का ही चिन्तन करता है, पाप की ही बात बोलता है और पाप ही करता है। जो इस प्रकार अधर्म की ओर प्रवृत्त हो जाता है, उसके साधु-गुण नष्ट हो जाते हैं।
व्याध उवाच