Agni’s Withdrawal to the Forest and Identification with Āṅgirasa (अग्न्याङ्गिरस-इतिहासः)
अनया क्रुद्धया दृष्ट्या क्रुद्ध: कि मां करिष्यसि । नावजानाम्यहं विप्रान् देवैस्तुल्यानू मनस्विन:,स्त्री बोली--तपोधन! क्रोध न करो। ब्रह्मर्ष! मैं बगुली नहीं हूँ जो तुम्हारी इस क्रोधभरी दृष्टिसे जल जाऊँगी। तुम इस तरह कुपित होकर मेरा क्या करोगे? मैं ब्राह्मणोंका अपमान नहीं करती। मनस्वी ब्राह्मण तो देवताके समान होते हैं
anayā kruddhayā dṛṣṭyā kruddhaḥ ki māṃ kariṣyasi | nāvajānāmy ahaṃ viprān devais tulyān manasvinaḥ ||
स्त्री बोली—इस क्रोधभरी दृष्टि से क्रुद्ध होकर आप मेरा क्या कर लेंगे? मैं ब्राह्मणों का अपमान नहीं करती; मनस्वी ब्राह्मण देवताओं के समान होते हैं।
ब्राह्मण उवाच