Dharma-vyādha on the Subtlety of Dharma, Karma, and the Continuity of the Jīva (Āraṇyaka-parva 200)
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऋषियों तथा पाण्डवोंने मार्कण्डेयजीसे पूछा --'भगवन्! कोई आपसे भी पहलेका उत्पन्न चिरजीवी इस जगतमें है या नहीं? ।। स तानुवाचास्ति खलु राजर्षिरिन्द्रद्मम्मो नाम क्षीणपुण्यस्त्रिदिवात् प्रच्युतः कीर्तिस्ति व्युच्छिन्नेति स मामुपातिष्ठदथ प्रत्यभिजानाति मां भवानिति,मार्कण्डेयजीने कहा--'है क्यों नहीं, सुनो। एक समय राजर्षि इन्द्रद्युम्न अपना पुण्य क्षीण हो जानेके कारण यह कहकर स्वर्गलोकसे नीचे गिरा दिये गये थे कि “जगतमें तुम्हारी कीर्ति नष्ट हो गयी है।” स्वर्गसे गिरनेपर वे मेरे पास आये और बोले--'“क्या आप मुझे पहचानते हैं?”
vaiśampāyana uvāca—janamejaya! ṛṣayaś ca pāṇḍavāś ca mārkaṇḍeyam apṛcchan—“bhagavan! ko ’pi tvatto ’pi pūrva-utpannaś cirajīvī ’smin jagati vidyate na vā?” sa tān uvāca—“asti khalu rājārṣir indradyumno nāma; kṣīṇa-puṇyas tridivāt pracyutaḥ. ‘kīrtis te vyucchinnā’ iti. sa mām upātiṣṭhad atha—‘pratyabhijānāti māṃ bhavān?’”
वैशम्पायनजी बोले— जनमेजय! ऋषियों और पाण्डवों ने मार्कण्डेयजी से पूछा— ‘भगवन्! क्या इस जगत् में आपसे भी पहले उत्पन्न कोई चिरजीवी है या नहीं?’ उन्होंने कहा— ‘हाँ, है। इन्द्रद्युम्न नाम के एक राजर्षि थे। जब उनका पुण्य क्षीण हो गया, तब उन्हें स्वर्ग से यह कहकर गिरा दिया गया— “जगत् में तुम्हारी कीर्ति कट गई है।” स्वर्ग से गिरकर वे मेरे पास आए और बोले— “क्या आप मुझे पहचानते हैं?”’
वैशम्पायन उवाच