Kuvalāśva’s Lineage and Uttaṅka’s Petition concerning Dhundhu (धुन्धु-प्रसङ्गः)
मार्कण्डेय उदाच श्रुत्वा वच: स मुनी राजपुत्र्या- स्तथास्त्विति प्राह कुरुप्रवीर । ततः स राजा मुदितो बभूव वाम्यौ चास्मै प्रददौ सम्प्रणम्य,मार्कण्डेयजी कहते हैं--कुरुकुलके प्रमुख वीर युधिष्ठिर! राजपुत्रीकी यह बात सुनकर वामदेव मुनिने कहा--'ऐसा ही होगा।” तब राजा दल बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने महर्षिको प्रणाम करके वे दोनों वाम्य अश्व उन्हें लौटा दिये
mārkaṇḍeya uvāca śrutvā vacaḥ sa munī rājaputryās tathāstv iti prāha kurupravīra | tataḥ sa rājā mudito babhūva vāmyau cāsmai pradadau sampraṇamya ||
मार्कण्डेयजी बोले—कुरुकुल-प्रवीर युधिष्ठिर! राजपुत्री के वचन सुनकर उस मुनि ने कहा—“ऐसा ही होगा।” तब राजा अत्यन्त प्रसन्न हुए और महर्षि को प्रणाम करके वे दोनों वाम्य अश्व उन्हें लौटा दिए।
वामदेव उवाच