Kuvalāśva’s Lineage and Uttaṅka’s Petition concerning Dhundhu (धुन्धु-प्रसङ्गः)
मा मण्डूकान् जिधघांस त्वं कोपं संधारयाच्युत । प्रक्षीयते धनोद्रेको जनानामविजानताम्,अच्युत! आप मेढकोंको मारनेकी इच्छा न करें। अपने क्रोधको रोकें; क्योंकि अविवेकसे काम लेनेवाले मनुष्योंके धनकी वृद्धि नष्ट हो जाती है
mā maṇḍūkān jidhaghāṃs tvaṃ kopaṃ saṃdhārayācyuta | prakṣīyate dhanodreko janānām avijānātām ||
हे अच्युत! आप मेढकों को मारने की इच्छा न करें। अपने क्रोध को रोकें; क्योंकि अविवेक से काम लेने वाले मनुष्यों की धन-समृद्धि की वृद्धि क्षीण होकर नष्ट हो जाती है।
वैशम्पायन उवाच