उत्तङ्कोपाख्यानप्रारम्भः — Uttanka’s Tapas, Viṣṇu-stuti, and the Dhundhumāra Prophecy
Opening
इदं चैवापरं भूय: सह भ्रातृभिरच्युत । धर्मसंशयमोक्षार्थ निबोध वचनं मम,धर्ममर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले युधिष्ठिर! तुम अपने भाइयोंसहित यह मेरी एक बात और सुनो। धर्मविषयक संदेहका निवारण करनेके लिये मेरे वचनको ध्यान देकर सुनो
idaṃ caivāparaṃ bhūyaḥ saha bhrātṛbhir acyuta | dharmasaṃśayamokṣārtha nibodha vacanaṃ mama ||
मार्कण्डेय बोले—हे अच्युत (धर्ममर्यादा से कभी न च्युत होने वाले) युधिष्ठिर! तुम अपने भाइयों सहित मेरी यह एक और बात सुनो। धर्म-विषयक संशय के निवारण हेतु मेरे वचन को ध्यान देकर सुनो।
मार्कण्डेय उवाच