इन्द्रद्युम्नोपाख्यानम्
Indradyumna Upākhyāna: On Kīrti, Smṛti, and Restoration
विक्रोशमानक्षान्योन्यं जनो गां पर्यटिष्यति । ततस्तुमुलसड्घाते वर्तमाने युगक्षये,प्रायः लोग स्वदेश छोड़कर दूसरे देशों, दिशाओं, नगरों और गाँवोंका आश्रय लेंगे और हा तात! हा पुत्र! इत्यादि रूपसे अत्यन्त दुःखद वाणीमें एक-दूसरेको पुकारते हुए इस पृथ्वीपर विचरेंगे। युगान्तकालमें संसारकी यही दशा होगी। उस समय एक ही साथ समस्त लोकोंका भयंकर संहार होगा
vikrośamānāḥ kṣāṇy anyonyaṃ jano gāṃ paryaṭiṣyati | tatas tumula-saṅghāte vartamāne yuga-kṣaye, prāyo lokāḥ sva-deśaṃ tyaktvā dvitīya-deśān diśo nagarāṇi grāmāṃś ca āśrayiṣyanti, “hā tāta! hā putra!” ity-ādi-rūpeṇa atyanta-duḥkha-vāṇyā parasparaṃ āhvayantaḥ pṛthivyāṃ vicariṣyanti | yugānta-kāle saṃsārasya eṣā daśā bhaviṣyati | tadā ekakālaṃ samasta-lokānāṃ bhayaṅkaraḥ saṃhāraḥ bhaviṣyati ||
लोग एक-दूसरे को पुकारते हुए इस पृथ्वी पर भटकेंगे। जब युग का क्षय होगा और सर्वत्र कोलाहलपूर्ण, कुचल देने वाली विपत्ति छा जाएगी, तब अधिकांश लोग अपना स्वदेश छोड़कर अन्य देशों, दिशाओं, नगरों और गाँवों में शरण लेंगे। ‘हाय पिता! हाय पुत्र!’ आदि शोकाकुल वाणी से एक-दूसरे को पुकारते हुए वे इस लोक में विचरेंगे। युगान्त में जगत की यही दशा होगी; तब एक ही बार में समस्त लोकों का भयंकर विनाश होगा।
मार्कण्डेय उवाच