इन्द्रद्युम्नोपाख्यानम्
Indradyumna Upākhyāna: On Kīrti, Smṛti, and Restoration
दस्युभि: पीडिता राजन् काका इव द्विजोत्तमा: । कुराजभिश्न सततं करभारप्रपीडिता:,राजन! श्रेष्ठ ब्राह्मण भी लुटेरोंसे पीड़ित होकर कौओंकी तरह काँव-काँव करते फिरेंगे। दुष्ट राजाओंके लगाये हुए करोंके भारसे सदा पीड़ित होनेके कारण वे धैर्य छोड़कर चल देंगे और शूद्रोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहकर धर्मविरुद्ध कार्य करेंगे। भूपाल! भयंकर कलियुगके अन्तमें जगत्की यही दशा होगी
dasyubhiḥ pīḍitā rājan kākā iva dvijottamāḥ | kurājabhiś ca satataṃ karabhāra-prapīḍitāḥ ||
मार्कण्डेय बोले—राजन्! लुटेरों से पीड़ित श्रेष्ठ द्विज काकों की भाँति करुण क्रन्दन करते हुए इधर-उधर भटकेंगे। दुष्ट राजाओं द्वारा लगाए गए करों के भार से सदा दबे रहकर वे धैर्य त्याग देंगे, अपने उचित मार्ग से हट जाएँगे और शूद्रों की सेवा में लगकर धर्म-विरुद्ध कर्म करने लगेंगे। भूपाल! कलियुग के भयानक अन्त में जगत की यही दशा होगी।
मार्कण्डेय उवाच