इन्द्रद्युम्नोपाख्यानम्
Indradyumna Upākhyāna: On Kīrti, Smṛti, and Restoration
ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: संकीर्यन्त: परस्परम्,ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य--से आपसमें संतानोत्पादन करके वर्णसंकर हो जायाँगे। वे सभी तपस्या और सत्यसे रहित हो शूद्रोंके समान हो जायँगे। अन्त्यज (चाण्डाल आदि) क्षत्रिय-वैश्य आदिके कर्म करेंगे और क्षत्रिय-वैश्य आदि चाण्डालोंके कर्म अपना लेंगे, इसमें संशय नहीं है
brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ saṅkīryantaḥ parasparam | brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ parasparaṃ santānotpādanena varṇasaṅkaraṃ gamiṣyanti | te sarve tapasā satyena ca rahitāḥ śūdravat bhaviṣyanti | antyajāḥ (cāṇḍālādayaḥ) kṣatriya-vaiśyādikarma kariṣyanti, kṣatriya-vaiśyādayaś ca cāṇḍālakarmāṇi grahīṣyanti—atra saṃśayo nāsti ||
मार्कण्डेय बोले— ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य परस्पर मिलकर मर्यादा-भंग से संतान उत्पन्न करेंगे और इस प्रकार वर्णसंकर हो जाएगा। तप और सत्य से रहित होकर वे आचरण में शूद्रों के समान हो जाएंगे। अन्त्यज (चाण्डाल आदि) क्षत्रिय-वैश्य के कर्म करने लगेंगे और क्षत्रिय-वैश्य चाण्डालों के कर्म अपना लेंगे—इसमें कोई संशय नहीं।
मार्कण्डेय उवाच