अध्याय १९० — वामदेव-वाम्य-वृत्तान्तः
The Vāmadeva Horses Episode and the Ethics of Promise
प्राप्तुंन शक्यो यो विद्वन् नरैर्दुष्कृतकर्मभि: । लोभाभिभूतै: कृपणैरनार्यरकृतात्मभि:,विद्वन्! पापकर्मा, लोभी, कृपण, अनार्य और अजितात्मा मनुष्य जिसे कभी नहीं पा सकते वह महान् फल मुझे ही समझो। मैं ही शुद्ध अन्तःकरणवाले मानवोंको सुलभ होनेवाला योगसेवित मार्ग हूँ। मूढ़ मनुष्योंके लिये मैं सर्वथा दुर्लभ हूँ
prāptuṃ na śakyo yo vidvan narair duṣkṛta-karmabhiḥ | lobhābhibhūtaiḥ kṛpaṇair anāryair akṛtātmabhiḥ || vidvan! pāpa-karmā lobhī kṛpaṇa anārya ajitātmā manuṣyaṃ yāṃ gatiṃ kadācid api na prāpnuvanti tat mahān phalaṃ mām eva jānīhi | aham eva śuddhāntaḥkaraṇavāle mānavebhyaḥ sulabho yogasevita-mārgaḥ | mūḍha-manuṣyebhyaḥ aham sarvathā durlabhaḥ ||
देव बोले—हे विद्वन्! दुष्कर्म करने वाले, लोभ से अभिभूत, कृपण, अनार्य और अजितात्मा मनुष्यों द्वारा जो प्राप्त नहीं किया जा सकता, उस महान् फल को मुझे ही जानो। योग से सेवित मार्ग मैं ही हूँ—शुद्ध अन्तःकरण वालों के लिए सुलभ, परन्तु विमूढ़ों के लिए सर्वथा दुर्लभ।
देव उवाच