कृतयुगवर्णनम् तथा राजधर्मोपदेशः
Kṛtayuga Description and Instruction on Royal Dharma
विद्युन्मालापिनद्धाड: समुत्तिष्ठन्ति वै घना: । घोररूपा महाराज घोरस्वननिनादिता: । ततो जलधरा: सर्वे व्याप्रुवन्ति नभस्तलम्,वे सभी बादल विद्युन्मालाओंसे अलंकृत होकर घिर आते हैं। महाराज! भयंकर गर्जना करनेके कारण उनका स्वरूप बड़ा भयानक जान पढ़ता है। धीरे-धीरे वे सभी जलधर समूचे आकाशमण्डलको ढक लेते हैं
vidyunmālāpinaddhāḥ samuttiṣṭhanti vai ghanāḥ | ghorarūpā mahārāja ghorasvananināditāḥ | tato jaladharāḥ sarve vyāpruvanti nabhastalam ||
वैशम्पायन बोले—महाराज! विद्युत्-मालाओं से अलंकृत घनघोर मेघ उठ खड़े होते हैं। भयंकर गर्जना से उनका रूप और भी भयावह हो जाता है। तब वे सब जलधर फैलकर समूचे नभ-मण्डल को ढक लेते हैं।
वैशम्पायन उवाच