कृतयुगवर्णनम् तथा राजधर्मोपदेशः
Kṛtayuga Description and Instruction on Royal Dharma
अनुभूतं हि बहुशस्त्वयैकेन द्विजोत्तम | न ते<स्त्यविदितं किंचित् सर्वलोकेषु नित्यदा,विप्रवर! केवल आपने ही अनेक कल्पोंकी श्रेष्ठ रचनाका बहुत बार अनुभव किया है। सम्पूर्ण लोकोंमें कभी कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो'
anubhūtaṃ hi bahuśas tvayaikena dvijottama | na te 'sty aviditaṃ kiṃcit sarvalokeṣu nityadā, vipravara ||
हे द्विजोत्तम, विप्रवर! अनेक युगों में आपने अकेले ही बार-बार बहुत कुछ देखा और अनुभव किया है। समस्त लोकों में, किसी भी समय, ऐसी कोई वस्तु नहीं जो आपसे अज्ञात हो।
वैशम्पायन उवाच