Sarasvatī–Tārkṣya Saṃvāda: Agnihotra-vidhi, Dāna-phala, and Mokṣa-prasaṅga (सरस्वती–तार्क्ष्यसंवादः)
वनमें पाण्डवोंसे श्रीकृष्ण-सत्यभामाका मिलना यदा जनौघ: कुरुजाड्लानां कृष्णां सभायामवशामपश्यत् | अपेतधर्मव्यवहार वृत्तं सहेत तत् पाण्डव कस्त्वदन्य:,'पाण्डुनन्दन! कुरुजांगलदेशकी जनताने द्यूतसभामें द्रौयदीको जिस विवश-अवस्थामें देखा था और उस समय उसके साथ जो पापपूर्ण बर्ताव किया गया था, उसे आपके सिवा दूसरा कौन सह सकता था?
vaiśampāyana uvāca | yadā janaughaḥ kurujāṅgalānāṃ kṛṣṇāṃ sabhāyām avaśām apaśyat | apeta-dharma-vyavahāra-vṛttaṃ saheta tat pāṇḍava kas tvad anyaḥ | pāṇḍu-nandana! kurujāṅgala-deśa-kī janatā ne dyūta-sabhā meṃ draupadī ko jis vivaśa-avasthā meṃ dekhā thā aur us samay uske sāth jo pāpa-pūrṇa bartāv kiyā gayā thā, use āpke sivā dūsrā kaun sah saktā thā? |
वैशम्पायन बोले—जब कुरुजांगल देश की जनसमूह ने सभा में द्यूत के समय कृष्णा (द्रौपदी) को विवश देखा और धर्म से च्युत वह पापपूर्ण व्यवहार होते हुए देखा, तब हे पाण्डव! तुम्हारे सिवा उसे कौन सह सकता था? पाण्डुनन्दन! द्यूतसभा में उसकी उस असहाय अवस्था को देखकर, तुम्हारे अतिरिक्त कौन धैर्य धारण कर पाता?
वैशम्पायन उवाच