Brāhmaṇa-māhātmya: Tārkṣya’s instruction on tapas, satya, and svadharma
Chapter 182
तत्र चापि नरव्यात्र मनो जन्तोर्विधीयते । तस्माद् युगपदत्रास्य ग्रहणं नोपपद्यते,नरश्रेष्ठ! विषयोंके उपभोगके समय (बुद्धिके द्वारा) इस जीवात्माका मन किसी एक ही विषयमें नियन्त्रित कर दिया जाता है। इसीलिये उसके द्वारा एक ही साथ अनेक विषयोंका ग्रहण सम्भव नहीं हो पाता है
tatra cāpi naravyāghra mano jantor vidhīyate | tasmād yugapad atrāsya grahaṇaṁ nopapadyate, naraśreṣṭha |
नरश्रेष्ठ! वहाँ भी विषय-भोग के समय जीव का मन (बुद्धि के द्वारा) किसी एक ही विषय में नियन्त्रित कर दिया जाता है; इसीलिए वह एक साथ अनेक विषयों का ग्रहण नहीं कर पाता।
सर्प उवाच