Karma, Preta-gati, and the Continuity of Phala
Mārkaṇḍeya’s Instruction
इदमार्ष प्रमाणं च ये यजामह इत्यपि । तस्माच्छील प्रधानेष्टं विदुर्ये तत््वदर्शिन:,सभी मनुष्य सदा सब जातियोंकी स्त्रियोंसे संतान उत्पन्न कर रहे हैं। वाणी, मैथुन तथा जन्म और मरण--ये सब मनुष्योंमें एक-से देखे जाते हैं। इस विषयमें यह आर्षप्रमाण भी मिलता है--'ये यजामहे' यह श्रुति जातिका निश्चय न होनेके कारण ही जो हमलोग यज्ञ कर रहे हैं, ऐसा सामान्यरूपसे निर्देश करती है। इसलिये जो तत्त्वदर्शी विद्वान हैं, वे शीलको ही प्रधानता देते हैं और उसे ही अभीष्ट मानते हैं
yudhiṣṭhira uvāca | idam ārṣa-pramāṇaṃ ca ye yajāmaha ity api | tasmāc chīla-pradhāneṣṭaṃ vidur ye tattva-darśinaḥ ||
युधिष्ठिर बोले— यहाँ एक आर्ष-प्रमाण भी है—श्रुति का वचन ‘ये यजामहे’ अर्थात ‘हम यज्ञ करते हैं’; यह जन्म-आधारित जाति का कठोर निश्चय किए बिना सामान्य रूप से कहता है। इसलिए जो तत्त्वदर्शी विद्वान हैं, वे शील-चरित्र को ही प्रधान मानते हैं और उसी को अभीष्ट कहते हैं।
युधिछिर उवाच