Kailāsa-darśana, Badarī-vāsa, and Sarasvatī–Dvaitavana Transition (कैलासदर्शन–बदरीवास–सरस्वतीद्वैतवनगमनम्)
(महत् पाशुपतं दिव्यं सर्वतोकनमस्कृतम् ।) ततो<पश्यं त्रिशिरसं पुरुषं नवलोचनम् त्रिमुखं षपड्भुजं दीप्तमर्कज्वलनमूर्थजम्,उसीको “रौद्रास्त्र” भी कहते हैं। वह समस्त शत्रुओंका विनाश करनेवाला है। वह महान् एवं दिव्य पाशुपतास्त्र सम्पूर्ण विश्वके लिये वन्दनीय है। उसका प्रयोग करते ही मुझे एक दिव्य पुरुषका दर्शन हुआ, जिनके तीन मस्तक, तीन मुख, नौ नेत्र तथा छः: भुजाएँ थीं। उनका स्वरूप बड़ा तेजस्वी था। उनके मस्तकके बाल सूर्यके समान प्रज्वलित हो रहे थे
mahat pāśupataṁ divyaṁ sarvatokanamaskṛtam | tato 'paśyaṁ triśirasaṁ puruṣaṁ navalocanam trimukhaṁ ṣaḍbhujaṁ dīptam arkajvalanamūrdhajam |
वह महान् दिव्य पाशुपतास्त्र समस्त लोकों द्वारा वन्दित है। उसे चलाते ही मैंने एक अद्भुत दिव्य पुरुष का दर्शन किया—तीन मस्तक, तीन मुख, नौ नेत्र और छः भुजाओं वाला—अत्यन्त दीप्तिमान, जिसके केश सूर्य के समान प्रज्वलित थे।
अजुन उवाच