Kailāsa-darśana, Badarī-vāsa, and Sarasvatī–Dvaitavana Transition (कैलासदर्शन–बदरीवास–सरस्वतीद्वैतवनगमनम्)
त्रिदशेशद्विषो यावत् क्षयमस्त्रैर्नयाम्यहम् न कथज्वचिद्धि मे पापा न वध्या ये सुरद्विष:,“जिससे देवराजके द्रोहियोंको मैं अपने अस्त्रोंद्वारा नष्ट कर डालूँ। जो देवताओंसे द्वेष रखते हैं, उन पापियोंको मैं किसी प्रकार मारे बिना नहीं छोड़ सकता”
tridaśeśa-dviṣo yāvat kṣayam astrair nayāmy aham | na kathañcid dhi me pāpā na vadhyā ye sura-dviṣaḥ ||
अर्जुन बोले—मैं अपने अस्त्रों से देवराज के शत्रुओं को विनाश तक पहुँचा दूँगा। जो देवताओं से द्वेष रखते हैं, वे पापी मेरे लिए किसी प्रकार अवध्य नहीं; उन्हें मारे बिना मैं छोड़ नहीं सकता।
अजुन उवाच