समुद्रदर्शनं दैत्यपुरोपगमनं च
Ocean Vision and Approach to the Daitya City
हि मय न () है 7 (निवातकवचयुद्धपर्व) पजञ्चषष्ट्यधिकशततमो< ध्याय: अर्जुनका गन्धमादन पर्वतपर आकर अपने भाइयोंसे मिलना वैशम्पायन उवाच ततः कदाचिटद्धरिसम्प्रयुक्तं महेन्द्रवाहं सहसोपयातम् । विद्युत्प्रभं प्रेक्ष्य महारथानां हर्षोडर्जुनं चिन्तयतां बभूव,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर किसी समय हरे रंगके घोड़ोंसे जुता हुआ देवराज इन्द्रका रथ सहसा आकाशमें प्रकट हुआ, मानो बिजली चमक उठी हो। उसे देखकर अर्जुनका चिन्तन करते हुए महारथी पाण्डवोंको बड़ा हर्ष हुआ
Vaiśampāyana uvāca: tataḥ kadāciddharisamprayuktaṃ mahendravāhaṃ sahasopayātam | vidyutprabhaṃ prekṣya mahārathānāṃ harṣo 'rjunaṃ cintayatāṃ babhūva ||
वैशम्पायन बोले—जनमेजय! तदनन्तर किसी समय हरे रंग के घोड़ों से जुता हुआ देवराज इन्द्र का रथ सहसा आकाश में प्रकट हुआ, मानो बिजली चमक उठी हो। उसे देखकर, अर्जुन का ही चिन्तन करते हुए महारथी पाण्डवों को बड़ा हर्ष हुआ।
वैशम्पायन उवाच