Kubera’s Arrival and the Disclosure of Agastya’s Curse
Vaiśaṃpāyana–Janamejaya Narrative
पपात रुधिरादिग्ध॑ संदष्टदशनच्छदम् । त॑ निहत्य महेष्वासो युधिष्ठिरमुपागमत् । स्तूयमानो द्विजाग्रयैस्तु मरुद्धिरिव वासव:,दाँतोंसे दबे हुए ओठवाला वह मस्तक खूनसे लथपथ होकर गिर पड़ा था। इस प्रकार जटासुरको मारकर महान धनुर्धर भीमसेन युधिष्ठिरके पास आये। उस समय श्रेष्ठ द्विज उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे, मानो मरुद्गण देवराज इन्द्रके गुण गा रहे हों
papāta rudhirādigdhaḥ saṃdaṣṭa-daśana-cchadam | taṃ nihatya maheṣvāso yudhiṣṭhiram upāgamat | stūyamāno dvijāgryais tu marudbhir iva vāsavaḥ ||
दाँतों से दबे हुए ओठों वाला वह मस्तक रक्त से लथपथ होकर भूमि पर गिर पड़ा। इस प्रकार जटासुर का वध करके महाधनुर्धर भीमसेन युधिष्ठिर के पास आए। उस समय श्रेष्ठ द्विज उनकी भूरि-भूरि स्तुति कर रहे थे, मानो मरुद्गण देवराज वासव (इन्द्र) के गुण गा रहे हों।
वैशम्पायन उवाच