Hanūmān’s Embrace, Counsel, and Promise to Amplify Bhīma’s Battle-Roar
Gandhamādana Continuation
न सामकरग्यजुर्वर्णा: क्रिया नासीच्च मानवी | अभिध्याय फल तत्र धर्म: संन्यास एव च,ऋतक्, साम और यजुर्वेदके मन्त्रवर्णोका पृथक्-पृथक् विभाग नहीं था। कोई मानवी क्रिया (कृषि आदि) भी नहीं होती थी। उस समय चिन्तन करनेमात्रसे सबको अभीष्ट फलकी प्राप्ति हो जाती थी। सत्ययुगमें एक ही धर्म था, स्वार्थका त्याग
na sāmakaṛg-yajurvarṇāḥ kriyā nāsīc ca mānavī | abhidhyāya phalaṃ tatra dharmaḥ saṃnyāsa eva ca ||
भीम बोले— उस युग में ऋक्, साम और यजुर्वेद के मन्त्रवर्णों का पृथक्-पृथक् विभाग नहीं था और न कृषि आदि कोई मानवी कर्म ही होता था। केवल मन में संकल्प/चिन्तन करने मात्र से ही सबको अभीष्ट फल मिल जाता था। कृत (सत्य) युग में एक ही धर्म था—संन्यास, अर्थात् स्वार्थ का त्याग।
भीम उवाच