गन्धमादन-हिमवत्प्रयाणे युधिष्ठिर-भीमसंवादः
Yudhiṣṭhira–Bhīma Dialogue on the Gandhamādana–Himavat Ascent
विषयान्ते कुलिन्दानामी श्वर: प्रीतिपूर्वकम् । ततस्ते पूजितास्तेन सर्व एव सुखोषिता:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार बातचीत करते हुए वे सब लोग आगे बढ़े। कुछ दूर जानेपर उन्हें कुलिन्दराज सुबाहुका विशाल राज्य दिखायी दिया, जहाँ हाथी- घोड़ोंकी बहुतायत थी, और सैकड़ों किरात, तंगण एवं कुलिन्द आदि जंगली जातियोंके लोग निवास करते थे। वह देवताओंसे सेवित देश हिमालयके अत्यन्त समीप था। वहाँ अनेक प्रकारकी आश्चर्यजनक वस्तुएँ दिखायी देती थीं। सुबाहुका वह राज्य देखकर उन सबको बड़ी प्रसन्नता हुई। कुलिन्दोंके राजा सुबाहुको जब यह पता लगा कि मेरे राज्यमें पाण्डव आये हैं, तब उसने राज्यकी सीमापर जाकर बड़े आदर-सत्कारके साथ उन्हें अपनाया। उसके द्वारा प्रेमसे पूजित होकर वे सब लोग बड़े सुखसे वहाँ रहे
vaiṣayānte kulindānām īśvaraḥ prītipūrvakam | tataste pūjitāstena sarva eva sukhoṣitāḥ ||
कुलिन्दों के प्रदेश-सीमान्त पर उनके अधिपति ने प्रीतिपूर्वक उनका स्वागत किया; और उसके द्वारा पूजित होकर वे सब वहाँ सुखपूर्वक रहे।
वैशम्पायन उवाच