Dyūta-doṣa-prakāśana — Kṛṣṇa’s Critique of Gambling and the Exile Crisis
तस्य युद्धार्थिनो दर्प युद्धे नाशयितास्म्यहम् । आनर्ता: सत्यमाख्यात तत्र गन्तास्मि यत्र सः,'उसे युद्धकी बड़ी इच्छा रहती है, आज उसके घमंडको मैं चूर कर दूँगा। आनर्तनिवासियो! सच-सच बतला दो। वह कहाँ है? जहाँ होगा, वहीं जाऊँगा और कंस तथा केशीका संहार करनेवाले उस कृष्णको मारकर ही लौटूँगा। मैं अपने अस्त्र-शस्त्रोंको छूकर सत्यकी सौगन्ध खाता हूँ कि अब कृष्णको मारे बिना नहीं लौटूँगा”
tasya yuddhārthino darpaṁ yuddhe nāśayitāsmy aham | ānartāḥ satyam ākhyāta tatra gantāsmi yatra saḥ ||
“युद्ध के लिए उतावले उस पुरुष का गर्व मैं रण में चूर कर दूँगा। हे आनर्त-निवासियो! सत्य-सत्य बतलाओ—वह कहाँ है? जहाँ होगा, वहीं मैं जाऊँगा।”
श्रीकृष्ण उवाच