Dyūta-doṣa-prakāśana — Kṛṣṇa’s Critique of Gambling and the Exile Crisis
श्र॒त्वा तं निहतं शाल्वस्तीव्ररोषसमन्वित: । उपायाद् द्वारकां शून्यामिहस्थे मयि भारत,श्रीकृष्णने कहा--भरतवंशशिरोमणे! कुरुकुलभूषण! मैं उन दिनों शाल्वके सौभ नामक नगराकार विमानको नष्ट करनेके लिये गया हुआ था। इसका क्या कारण था, वह बतलाता हूँ, सुनिये। भरतश्रेष्ठी आपके राजसूययज्ञमें अग्रपूजाके प्रश्नको लेकर जो क्रोधके वशीभूत हो इस कार्यको नहीं सह सका था और इसीलिये जिस दुरात्मा, महातेजस्वी, महाबाहु एवं महायशस्वी दमघोषनन्दन वीर राजा शिशुपालको मैंने मार डाला था; उसकी मृत्युका समाचार सुनकर शाल्व प्रचण्ड रोषसे भर गया। भारत! मैं तो यहाँ हस्तिनापुरमें था और वह हमलोगोंसे सूनी द्वारकापुरीमें जा पहुँचा
śrutvā taṁ nihataṁ śālvas tīvra-roṣa-samanvitaḥ | upāyād dvārakāṁ śūnyām iha-sthe mayi bhārata ||
श्रीकृष्ण ने कहा— भारत! उसके मारे जाने का समाचार सुनकर शाल्व तीव्र क्रोध से भर उठा और जब मैं यहाँ ठहरा हुआ था, तब उसने सूनी द्वारका पर चढ़ाई कर दी।
श्रीकृष्ण उवाच