अष्टावक्र-प्रवेशः तथा ब्रह्मोद्य-प्रारम्भः
Aṣṭāvakra’s Entry and the Opening of the Brahmodya
तस्या गर्भ: समभवदग्निकल्प: सो<धीयानं पितरं चाप्युवाच । सर्वा रात्रिमध्ययनं करोषि नेदं पितः सम्यगिवोपवर्तते,< कुछ कालके बाद सुजाता गर्भवती हुई, उसका वह गर्भ अग्निके समान तेजस्वी था। एक दिन स्वाध्यायमें लगे हुए अपने पिता कहोड मुनिसे उस गर्भस्थ बालकने कहा, “पिताजी! आप रातभर वेदपाठ करते हैं तो भी आपका वह अध्ययन अच्छी प्रकारसे शुद्ध उच्चारणपूर्वक नहीं हो पाता”
tasyā garbhaḥ samabhavad agnikalpaḥ so ’dhīyānaṃ pitaraṃ cāpy uvāca | sarvā rātrim adhyayanaṃ karoṣi nedaṃ pitaḥ samyag ivopavartate ||
कुछ काल के बाद सुजाता गर्भवती हुई; उसका गर्भ अग्नि के समान तेजस्वी था। एक दिन पिता कहोड मुनि रात्रि भर स्वाध्याय में लगे थे, तब गर्भस्थ पुत्र ने उनसे कहा— “पिताजी! आप सारी रात वेदपाठ करते हैं, फिर भी आपका पाठ ठीक प्रकार से, शुद्ध उच्चारण के साथ, नहीं चल पाता।”
लोगश उवाच