Aṣṭāvakra–Kahoda Upākhyāna: Śvetaketu’s Āśrama, Sarasvatī, and the Origin of Aṣṭāvakra
राजोवाच संत्रस्तरूपस्त्राणार्थी त्वत्तो भीतो महाद्विज । मत्सकाशमनुप्राप्त: प्राणगृध्नुर॒यं द्विज:,राजा बोले--पक्षिराज! यह कबूतर तुमसे डरकर घबराया हुआ है और अपने प्राण बचानेकी इच्छासे मेरे समीप आया है। यह अपनी रक्षा चाहता है। बाज! इस प्रकार अभय चाहनेवाले इस कबूतरको यदि मैं तुमको नहीं सौंप रहा हूँ, यह तो परम धर्म है। इसे तुम कैसे नहीं देख रहे हो?
rājovāca saṁtrastarūpas trāṇārthī tvatto bhīto mahādvija | matsakāśam anuprāptaḥ prāṇagṛdhnuḥ ayaṁ dvijaḥ ||
राजा बोले—“महाद्विज! यह कबूतर तुमसे भयभीत होकर, त्राण की इच्छा से, प्राणों की रक्षा चाहता हुआ मेरे पास आया है।”
श्येन उवाच