Plakṣāvataraṇa–Yamunā Tīrtha and Prajāpati’s Vedī
Kurukṣetra Threshold
पश्य नानाविधाकारैरग्निभिन्निचितां महीम् । मज्जन्तीमिव चाक्रान्तां ययातेर्यज्ञकर्मभि:,देखो, यहाँ अग्नियोंसे युक्त नाना प्रकारकी वेदियाँ हैं, जिनसे यह सारी भूमि व्याप्त हो रही है; मानो पृथ्वी ययातिके यज्ञकर्मोंसे आक्रान्त हो उनकी पुण्य-धारामें डूबी जा रही है
देखो, नाना प्रकार की आकृतियों वाली अग्नियों से युक्त वेदियों से यह भूमि भरी पड़ी है। मानो ययाति के यज्ञकर्मों से आक्रान्त होकर यह पृथ्वी पुण्यधारा में डूबती जा रही हो।
लोगश उवाच