Akṛtavraṇa’s Account Begins: Gādhi–Satyavatī–Ṛcīka and the Bhārgava Lineage Prelude
कदा तु रामो भगवांस्तापसान् दर्शयिष्यति । तेनैवाहं प्रसंगेन द्रष्टमिच्छामि भार्गवम्,उन सबसे मिलकर राजर्षि युधिष्ठिरने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और परशुरामजीके सेवक वीरवर अकृतत्रणसे पूछा--“भगवान् परशुरामजी इन तपस्वी महात्माओंको कब दर्शन देंगे? उसी निमित्तसे मैं भी उन भगवान् भार्गवका दर्शन करना चाहता हूँ!
kadā tu rāmo bhagavāṁs tāpasān darśayiṣyati | tenaivāhaṁ prasaṅgena draṣṭum icchāmi bhārgavam ||
“भगवान् राम (परशुराम) इन तपस्वियों को कब दर्शन देंगे? उसी अवसर से मैं भी उस दिव्य भार्गव का दर्शन करना चाहता हूँ।”
वैशम्पायन उवाच