Adhyāya 112: Ṛṣyaśṛṅga’s Description of an Exemplary Brahmacārī
Ascetic Presence and Vow-Practice
आश्चर्यरूपा पुनरस्यथ कण्ठे विभ्राजते विद्युदिवान्तरिक्षे | दौ चास्य पिण्डावधरेण कण्ठा- दजातरोमौ सुमनोहरौ च,उसके गलेमें एक ऐसा आश्चर्यजनक आभूषण (कण्ठा) था, जो आकाशमें बिजलीकी भाँति चमक रहा था। उसके गलेसे नीचे (वक्ष:स्थलपर) दो मांसपिण्ड थे, जिनपर रोएँ नहीं उगे थे। वे अत्यन्त मनोहर जान पड़ते थे
āścaryarūpā punar asyatha kaṇṭhe vibhrājate vidyud ivāntarikṣe | dvau cāsya piṇḍāv adhareṇa kaṇṭhād ajātaromau sumanoharau ca ||
उसके कण्ठ में एक अद्भुत कण्ठाभूषण था, जो आकाश में बिजली की भाँति चमक रहा था। और कण्ठ के नीचे दो मांसपिण्ड थे—उन पर रोएँ नहीं थे—वे अत्यन्त मनोहर प्रतीत होते थे।
ऋष्यशुड्र उवाच